: 2018 से कई बार शुरू हुई फर्जी शिक्षकों की जांच, FIR में देरी से कार्रवाई प्रभावित
लखनऊ। उत्तर प्रदेश के परिषदीय विद्यालयों में फर्जी शैक्षिक प्रमाणपत्रों के आधार पर नौकरी पाने वाले शिक्षकों की पहचान के लिए जांच का मामला एक बार फिर चर्चा में है। दैनिक जागरण में प्रकाशित खबर के अनुसार, वर्ष 2018 से कई बार जांच शुरू होने के बावजूद विभागीय स्तर पर देरी और FIR दर्ज कराने में विलंब के कारण अनेक मामले लंबे समय तक लंबित रहे।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने दिया एक सप्ताह में कार्रवाई का निर्देश
खबर के मुताबिक, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कक्षा एक से आठ तक के शिक्षकों के नियुक्ति पत्र और शैक्षिक प्रमाणपत्रों की जांच कराने का निर्देश दिया था। हालांकि, पहले भी कई बार जांच शुरू होने के बावजूद कार्रवाई में देरी की समस्या सामने आई।
2018 और 2011 की भर्तियों के दस्तावेजों की जांच
फर्जी नियुक्तियों की जांच के लिए वर्ष 2018 और वर्ष 2011 में हुई भर्तियों से संबंधित दस्तावेजों की पड़ताल शुरू की गई थी। इसके लिए जिलों में समितियां गठित की गईं, जिनमें पुलिस और शिक्षा विभाग के अधिकारी शामिल थे।
रिपोर्ट के अनुसार, जांच में देरी और कार्रवाई में ढिलाई के कारण कई मामले लंबे समय तक अटके रहे। कुछ आरोपित शिक्षकों को अदालत से स्थगन आदेश मिलने के कारण भी कार्रवाई प्रभावित हुई।
10 हजार से अधिक शिक्षकों के दस्तावेज संदेह के घेरे में
समाचार रिपोर्ट में उल्लेख है कि एसटीएफ से मिले इनपुट के आधार पर 10 हजार से अधिक शिक्षकों के दस्तावेज संदेह के घेरे में आए थे। हालांकि, दस्तावेज संदिग्ध होने का अर्थ यह नहीं है कि सभी संबंधित शिक्षक दोषी पाए गए हैं। प्रत्येक मामले में प्रमाणपत्रों और नियुक्ति अभिलेखों का सत्यापन आवश्यक है।
2020 और 2022 में भी सामने आए मामले
रिपोर्ट के मुताबिक, वर्ष 2020 में कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालयों में अनामिका शुक्ला प्रकरण से जुड़े कथित दस्तावेजी दुरुपयोग के मामले सामने आए थे। इसके बाद जून 2022 में एसटीएफ ने विभिन्न जिलों में कार्यरत संदिग्ध शिक्षकों से संबंधित सूची तैयार की थी।
प्रमाणपत्र सत्यापन में देरी बनी बड़ी चुनौती
खबर में हरदोई, कुशीनगर सहित कुछ जिलों में वेतन वसूली के नोटिस जारी किए जाने का उल्लेख है। साथ ही, विभिन्न राज्यों और विश्वविद्यालयों से शैक्षिक प्रमाणपत्रों का सत्यापन समय पर नहीं हो पाने को जांच में देरी का एक प्रमुख कारण बताया गया है।
आगे क्या होगा?
फर्जी प्रमाणपत्रों के आधार पर नियुक्ति की पुष्टि होने पर संबंधित शिक्षक के विरुद्ध नियमानुसार विभागीय और कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। लेकिन किसी भी कर्मचारी के संबंध में अंतिम निर्णय सत्यापन, जांच के निष्कर्ष और निर्धारित कानूनी प्रक्रिया के आधार पर ही लिया जाना चाहिए।
