अवकाश के कारण एक दिन देर से ज्वाइनिंग पर नहीं रुकेगी शिक्षकों की वेतनवृद्धि : कोर्ट
1059 सहायक अध्यापकों की पहली वार्षिक वेतनवृद्धि
प्रयागराज : इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बेसिक शिक्षा विभाग के 1059 सहायक अध्यापकों की पहली वार्षिक वेतनवृद्धि के मामले में राज्य सरकार को उनके दावे पर पुनर्विचार करने का निर्देश दिया है। कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक अवकाश के कारण अगले कार्यदिवस पर कार्यभार ग्रहण करने से कर्मचारी के सेवा लाभप्रभावित नहीं हो सकते। न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकलपीठ ने सीमा राय व तीन अन्य सहित 16 याचिकाओं का निस्तारण करते हुए सक्षम प्राधिकारी को छह सप्ताह में याची शिक्षकों के व्यक्तिगत प्रतिवेदनों पर तर्कसंगत आदेश पारित करने का निर्देश दिया।
याची शिक्षकों की नियुक्ति 28 जून 2016 को हुई थी। पहली जुलाई को रमजान का अंतिम शुक्रवार होने के कारण सार्वजनिक अवकाश था। इसलिए वे 28 जून की नियुक्ति के बावजूद पहली जुलाई को कार्यभार ग्रहण नहीं कर सके और दो जुलाई को ज्वाइनिंग दी। विवाद इस बात को लेकर था कि वेतनवृद्धि के लिए नियुक्ति तिथि 28 जून मानी जाए या कार्यभार ग्रहण करने की तिथि दो जुलाई। 22 दिसंबर 2016 के शासनादेश के अनुसार दो जनवरी से पहली जुलाई के बीच नियुक्त कर्मचारियों को पहली जनवरी से वेतनवृद्धि
हाई कोर्ट ने कहा- वेतनवृद्धि विवेकाधीन लाभ नहीं, सेवा नियमों से मिला अधिकार
मिलती है, जबकि दो जुलाई से पहली जनवरी के बीच नियुक्त कर्मचारियों को अगली पहली जुलाई से यह लाभ मिलता है। शिक्षकों का कहना था कि उनकी नियुक्ति 28 जून को हुई थी, इसलिए उन्हें पहली जनवरी 2017 से वेतनवृद्धि मिलनी चाहिए थी, जबकि विभाग ने दो जुलाई को योगदान के आधार पर यह लाभ एक जुलाई 2017 से देने की स्थिति अपनाई।
याचीगण ने बेसिक शिक्षा परिषद प्रयागराज के वित्त नियंत्रक के 20 नवंबर 2025 के पत्र का भी हवाला दिया, जिसमें शासनादेश में 'नियुक्ति तिथि' का उल्लेख होने की बात कही गई थी। उन्होंने 2009 के शासनादेश का भी ठ किया, जिसमें सार्वजनिक अवकाश के कारण अगले कार्यदिवस पर कार्यभार ग्रहण करने को कर्मचारी के हित के विरुद्ध नहीं माने जाने का प्रविधान है। राज्य सरकार की ओर से वास्तविक योगदान तिथि दो जुलाई को सेवा लाभों का आधार मानने का तर्क दिया गया। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि एक दिन का अंतर पूरी तरह सार्वजनिक अवकाश के कारण हुआ और यह शिक्षकों के नियंत्रण से बाहर था। इसलिए इससे उनके सेवा लाभ प्रभावित नहीं किए जा सकते। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि वेतनवृद्धि विवेकाधीन लाभ नहीं, बल्कि सेवा नियमों से नियंत्रित अधिकार है। साथ ही कहा कि यह निर्णय हर मामले में नियुक्ति तिथि को योगदान तिथि पर वरीयता देने का सामान्य सिद्धांत नहीं है। संबंधित प्राधिकारी को इस मामले में नियुक्ति, योगदान और अवकाश की परिस्थितियों पर विचार कर निर्णय लेना होगा।
