आखिर कब तक शिक्षक देते रहेंगे अपनी ईमानदारी का प्रमाण? नौकरी के दौरान बार-बार शपथपत्र देने पर उठे सवाल
बेसिक शिक्षा विभाग में शिक्षकों के अभिलेखों के सत्यापन और बार-बार शपथपत्र लिए जाने की प्रक्रिया को लेकर शिक्षकों में नाराजगी देखने को मिल रही है। शिक्षकों का सवाल है कि आखिर एक ही बात को कितनी बार प्रमाणित करना होगा? नियुक्ति से लेकर स्थानांतरण तक हर महत्वपूर्ण प्रक्रिया में शिक्षक को अपनी और अपने शैक्षिक अभिलेखों की सत्यता का प्रमाण देना पड़ रहा है।
एक शिक्षक ने इस व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए कहा कि बेसिक शिक्षा विभाग में नियुक्त होने के बाद एक शिक्षक अपनी ईमानदारी और अभिलेखों की सत्यता का प्रमाण नौकरी के दौरान लगभग चार-पांच बार दे चुका होता है।
नियुक्ति से स्थानांतरण तक बार-बार शपथपत्र
शिक्षकों के अनुसार, अलग-अलग विभागीय प्रक्रियाओं में पहले भी इसी विषय पर शपथपत्र या घोषणा पत्र लिया जा चुका है।
नियुक्ति के समय: शिक्षक ने अपने शैक्षिक अभिलेखों और पात्रता की सत्यता के संबंध में शपथपत्र दिया।
वेतन आहरण आदेश के समय: वेतन जारी करने की प्रक्रिया में भी इसी संबंध में शपथपत्र लिया गया।
अवशेष वेतन भुगतान के समय: बकाया वेतन भुगतान के आदेश के लिए भी इसी विषय पर शपथपत्र देना पड़ा।
मानव संपदा पोर्टल पर: सभी शैक्षिक एवं सेवा संबंधी अभिलेख अपलोड करते समय भी सत्यता की घोषणा की गई।
स्थानांतरण प्रक्रिया में: अब स्थानांतरण के दौरान भी इसी प्रकार का शपथपत्र मांगे जाने की बात सामने आ रही है।
आखिर कब तक साबित करनी होगी अपनी ईमानदारी?
शिक्षकों का कहना है कि यदि नियुक्ति के समय ही सभी मूल अभिलेखों का विधिवत सत्यापन कर लिया गया था और विभागीय रिकॉर्ड में उनकी पुष्टि दर्ज है, तो प्रत्येक नई विभागीय प्रक्रिया में उसी सत्यता का प्रमाण दोबारा मांगने का औचित्य क्या है?
शिक्षकों का मानना है कि विभाग को अपने रिकॉर्ड और सत्यापन प्रणाली को इतना मजबूत बनाना चाहिए कि एक बार प्रमाणित हो चुके अभिलेखों के लिए बार-बार शपथपत्र लेने की आवश्यकता न पड़े।
विभाग की सत्यापन व्यवस्था पर भी उठ रहे सवाल
इस पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर इतने वर्षों बाद भी विभाग शिक्षकों के अभिलेखों के सत्यापन की ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बना पाया, जिससे एक बार सत्यापित शिक्षक के रिकॉर्ड को भविष्य की सभी विभागीय प्रक्रियाओं में मान्य किया जा सके?
शिक्षकों का कहना है कि फर्जी अभिलेखों के आधार पर नौकरी पाने वालों के खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी चाहिए, लेकिन सभी शिक्षकों को बार-बार संदेह के दायरे में रखकर अपनी ईमानदारी साबित करने के लिए बाध्य करना उचित नहीं है।
शिक्षकों की मांग
शिक्षकों की मांग है कि विभाग एक केंद्रीकृत और प्रमाणित डिजिटल रिकॉर्ड तैयार करे। एक बार अभिलेखों का सत्यापन पूरा होने के बाद नियुक्ति, वेतन, स्थानांतरण और पदोन्नति जैसी प्रक्रियाओं में उसी रिकॉर्ड का उपयोग किया जाए।
सवाल सिर्फ एक शपथपत्र का नहीं, बल्कि उस भरोसे का है जो एक शिक्षक और उसके विभाग के बीच होना चाहिए। आखिर कब तक हर शिक्षक को बार-बार यह साबित करना पड़ेगा कि वह असली शिक्षक है, फर्जी नहीं?
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