कोर्ट ने यूपीटीईटी में आधे अंकों की दी थी छूट, यहां दशमलव से फेल: नॉर्मलाइजेशन में अंक काटने के कारण कई हो गए फेल
यूपीटीईटी में लागू नॉर्मलाइजेशन के फॉर्मूले ने कई अभ्यर्थियों के सपने चकनाचूर कर दिए हैं। परीक्षा देने के बाद जब इन अभ्यर्थियों ने हल किए गए प्रश्नों का उत्तरकुंजी से मिलान किया था तो आश्वस्त थे कि वह पास हो जाएंगे। हालांकि उत्तर प्रदेश शिक्षा सेवा चयन आयोग की ओर से यूपीटीईटी में पहली बार लागू की गई नॉर्मलाइजेशन व्यवस्था के कारण वह दशमलव के भी दशांस से फेल हो गए हैं। इनमें से तमाम अभ्यर्थियों ने चयन आयोग को प्रत्यावेदन देकर पास करने की गुहार लगाई है।
अभ्यर्थियों का तर्क है कि परीक्षा नियामक प्राधिकारी कार्यालय ने 2013 में आयोजित यूपीटीईटी में आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों को 150 के पूर्णांक में 55 प्रतिशत के लिहाज से 82.5 अंकों पर पास किया था। उस परीक्षा में 82 अंक (दशमलव पांच अंकों से फेल) पाने वाले आरक्षित वर्ग के अभ्यर्थियों ने याचिकाएं की थी तो हाईकोर्ट ने दशमलव पांच अंकों की छूट देते हुए 82 नंबर पर पास करने का आदेश दिया था। यह आदेश आज तक हुई सभी परीक्षाओं में लागू होता आ रहा है। ऐसे में नॉर्मलाइजेशन के नाम पर दशमलव के दहाई, सैकड़ा और हजारवें हिस्से से अभ्यर्थियों को फेल करना नाइंसाफी है। इनमें से तमाम बेरागजगार अभ्यर्थी परिषदीय प्राथमिक स्कूलों में आगामी सहायक अध्यापक भर्ती से वंचित हो जाएंगे तो वहीं इस एक फॉर्मूल के कारण बड़ी संख्या में सेवारत शिक्षकों की नौकरी भी दांव पर लगी है। वैसे भी ललित मोहन सिंह के केस में जस्टिस सुधीर अग्रवाल ने 2011 में यह आदेश दिया था कि हर प्रश्न पर एक अंक निर्धारित है। उस अंक को कम नहीं किया जा सकता है। उत्तीर्ण होने वालों को अंक कम करके अनुत्तीर्ण नहीं किया जा सकता है।
