निलंबन अवधि में काम पर उपस्थित न होने पर कर्मचारी वेतन-पेंशन का हकदार नहीं
प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि निलंबन अवधि में काम पर उपस्थित न होने मामला 1 की स्थिति में कर्मचारी को उस अवधि का पूरा वेतन और अन्य सेवा लाभ पाने का
मथुरा निवासी सेवानिवृत्त ने वेतन देने की मांग की थी
अधिकार नहीं है। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति मंजू रानी चौहान की एकल पीठ ने मथुरा के सेवानिवृत्त याचिका खारिज कर दी।
प्रधानाध्यापक कांता प्रसाद की पास रखे। 22-08-202
कांता प्रसाद सरखंड खेड़ा स्थित प्राथमिक विद्यालय में प्रधानाध्यापक
के पद पर कार्यरत थे। 10 फरवरी 1992 अधिकारी ने उन्हें निलंबित कर दिया था। आरोप था कि उन्होंने विद्यालय का चार्ज अपने उत्तराधिकारी को नहीं सौंपा और कैश बुक, पासबुक, चेक बुक जैसे महत्वपूर्ण दस्तावेज अपने
मामले में बलदेव थाने में लोक सेवक की ओर विश्वासघात करने करने के आरोप में एफआईआर दर्ज कराई
गई। वर्ष 1997 में मुख्य न्यायिक ने हुए एक साल की सजा सुनाई।
कांता प्रसाद 30 जून 2000 को सेवानिवृत्ति के बाद वेतन, पेंशन और अन्य लाभों के लिए बीएसए को प्रत्यावेदन दिया। उनके प्रत्यावेदन को खारिज कर दिया गया। इसे उन्होंने हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने पाया कि कांता प्रसाद न तो स्थानांतरण के बाद निर्धारित स्थान
पर उपस्थित हुए और न ही किए।
यह भी साबित नहीं किए कि वह कार्य पर लौटने के इच्छुक थे, लेकिन विभाग ने उन्हें काम करने से रोका। कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में 'काम नहीं तो वेतन नहीं' का सिद्धांत लागू होगा। ऐसे में याची को निलंबन अवधि का वेतन, भत्ते और पेंशन संबंधी लाभ पाने का अधिकार नहीं है।
