परिषदीय स्कूल सुधारना है तो पहले समस्या समझिए, शिक्षक को सिर्फ टारगेट मत बनाइए
लखनऊ। परिषदीय विद्यालयों को बेहतर बनाने की कोशिश लगातार जारी है। स्कूलों में निरीक्षण, निगरानी और जवाबदेही व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं, लेकिन केवल कमियां देखकर कैमरा ऑन कर देना और शिक्षक से सवाल-जवाब शुरू कर देना ही स्कूल सुधार का पूरा रास्ता नहीं हो सकता। वास्तविक सुधार के लिए स्कूल की स्थिति के साथ-साथ उसके सामाजिक और व्यवस्थागत परिवेश को समझना भी जरूरी है।
स्कूल में आखिर सुधार किस चीज का करना है?
किसी विद्यालय में पहुंचकर यदि बच्चों की कम उपस्थिति, संसाधनों की कमी, भवन की समस्या या किसी अन्य कमी को देखा जाता है, तो सबसे पहले यह समझना जरूरी है कि उस समस्या की वास्तविक वजह क्या है।
मसलन, यदि बच्चों की उपस्थिति कम है तो इसके पीछे केवल शिक्षक की लापरवाही ही कारण नहीं हो सकती। परिवार की आर्थिक स्थिति, अभिभावकों की जागरूकता, घर से स्कूल की दूरी, स्थानीय परिस्थितियां और बच्चों से जुड़े अन्य सामाजिक कारण भी जिम्मेदार हो सकते हैं।
इसी तरह यदि विद्यालय में संसाधनों की कमी है तो केवल शिक्षक से जवाब मांगने से समस्या का स्थायी समाधान नहीं निकलेगा। इसके लिए विभागीय स्तर पर उपलब्ध संसाधनों और व्यवस्थाओं की भी समीक्षा करनी होगी।
गांव और अभिभावकों से संवाद जरूरी
स्कूल सुधार की शुरुआत विद्यालय की चारदीवारी से बाहर निकलकर भी करनी होगी। गांव में घर-घर जाकर अभिभावकों से बातचीत की जाए और यह समझने का प्रयास किया जाए कि बच्चे नियमित रूप से स्कूल क्यों नहीं आ रहे हैं।
बच्चों से उनकी वास्तविक समस्याओं के बारे में बात करना भी उतना ही जरूरी है। कई बार जो समस्या निरीक्षण के दौरान दिखाई देती है, उसके पीछे कई ऐसी परिस्थितियां होती हैं जो कागजों या कुछ मिनट के निरीक्षण में सामने नहीं आतीं।
शिक्षकों से पूछताछ नहीं, संवाद भी जरूरी
शिक्षक विद्यालय व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। जहां लापरवाही है, वहां जवाबदेही निश्चित रूप से तय होनी चाहिए। लेकिन हर समस्या का जिम्मेदार केवल शिक्षक को मान लेना भी उचित नहीं है।
शिक्षक से सवाल पूछने के साथ-साथ उसकी बात सुनना भी जरूरी है। यदि किसी समस्या के समाधान के लिए शिक्षक को विभागीय सहयोग, संसाधन या किसी अन्य स्तर पर सहायता की जरूरत है, तो उस दिशा में भी काम होना चाहिए।
जिम्मेदारी सिर्फ शिक्षक की नहीं
एक बेहतर स्कूल केवल शिक्षक के प्रयास से नहीं बनता। इसके लिए शिक्षक, विद्यार्थी, अभिभावक, विभाग और समाज सभी की भूमिका महत्वपूर्ण है।
विद्यालय में यदि भवन की समस्या है तो उसके समाधान के लिए विभाग और स्थानीय स्तर पर प्रयास जरूरी हैं। यदि बच्चों की उपस्थिति कम है तो अभिभावकों और समुदाय को भी जोड़ना होगा। यदि शिक्षण व्यवस्था में कमी है तो शिक्षक को आवश्यक मार्गदर्शन और सहयोग भी मिलना चाहिए।
कैमरे के सामने कार्रवाई से ज्यादा जरूरी है समाधान
आज निरीक्षण के दौरान वीडियो बनाना और कमियों को सार्वजनिक करना आसान है, लेकिन किसी समस्या की जड़ तक पहुंचकर उसका स्थायी समाधान करना ज्यादा महत्वपूर्ण है।
निरीक्षण का उद्देश्य केवल गलती पकड़ना नहीं, बल्कि यह पता लगाना भी होना चाहिए कि समस्या क्यों पैदा हुई और उसे दूर करने के लिए क्या किया जा सकता है।
कमियां खोजिए, लेकिन समाधान भी खोजिए।
सवाल पूछिए, लेकिन शिक्षक की बात भी सुनिए।
जवाबदेही तय करिए, लेकिन जिम्मेदारी का दायरा पूरी व्यवस्था में देखिए।
शिक्षक को टारगेट नहीं, सुधार का साझेदार बनाइए
परिषदीय विद्यालयों में सुधार के लिए शिक्षकों की जवाबदेही जरूरी है, लेकिन उन्हें केवल समस्याओं के लिए जिम्मेदार ठहराने के बजाय सुधार की प्रक्रिया का साझेदार बनाया जाना चाहिए।
यदि उद्देश्य वास्तव में स्कूलों को बेहतर बनाना है तो निरीक्षण व्यवस्था ऐसी होनी चाहिए जिसमें समस्या की पहचान, कारणों की पड़ताल, संवाद, सहयोग और समाधान सभी शामिल हों।
आखिर सवाल यही है कि हम स्कूल सुधारने के लिए मैदान में उतर रहे हैं या स्कूल की हर समस्या के लिए केवल शिक्षक को जिम्मेदार ठहराने के लिए?
स्कूल सुधार का रास्ता कैमरे के सामने शिक्षक को कटघरे में खड़ा करने से नहीं, बल्कि जमीन पर उतरकर समस्या की जड़ तक पहुंचने से निकलेगा।
इसलिए अगली बार किसी परिषदीय विद्यालय का निरीक्षण करते समय कैमरा ऑन करने से पहले एक बार यह जरूर पूछिए—“इस स्कूल की समस्या वास्तव में क्या है और इसका समाधान कैसे होगा?”
यही सोच वास्तविक स्कूल सुधार की शुरुआत बन सकती है।
