विद्यालय निरीक्षण के नाम पर अध्यापक ही हर समस्या का दोषी क्यों?
MDM में गड़बड़ी — शिक्षक जिम्मेदार।
विद्यालय में सफाई नहीं — शिक्षक जिम्मेदार।
छत गिर गई — शिक्षक जिम्मेदार।
बच्चे स्कूल नहीं आए — शिक्षक जिम्मेदार।
बच्चे ड्रेस में नहीं आए — शिक्षक जिम्मेदार।
नामांकन कम है — शिक्षक जिम्मेदार।
शिक्षक की किसी अन्य विभागीय कार्य में ड्यूटी लगी — फिर भी शिक्षक जिम्मेदार।
आज स्थिति यह हो गई है कि विद्यालय पर हर कोई कैमरा और माइक लेकर पहुँच रहा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हर समस्या का समाधान केवल शिक्षक को कटघरे में खड़ा करके ही होगा?
आज कुछ यूट्यूबर और तथाकथित पत्रकारों के लिए प्राथमिक विद्यालय और प्राथमिक शिक्षक सबसे आसान टारगेट बन गए हैं।
कैमरा उठाइए, विद्यालय में जाइए, कुछ अधूरी जानकारी लीजिए, एकतरफा वीडियो बनाइए और सोशल मीडिया पर वायरल कर दीजिए।
लेकिन क्या कभी यह जानने की कोशिश भी होती है कि वास्तविक जिम्मेदारी किसकी है?
MDM की व्यवस्था किसकी है?
विद्यालय की सफाई के लिए सफाईकर्मी उपलब्ध है या नहीं?
जर्जर भवन की सूचना विद्यालय द्वारा पहले दी गई थी या नहीं?
ड्रेस और अन्य योजनाओं का पैसा किसके खाते में जाता है?
बच्चा विद्यालय क्यों नहीं आ रहा—क्या उसके पीछे परिवार की आर्थिक और सामाजिक परिस्थितियां भी हैं?
क्या हर बच्चे की अनुपस्थिति के लिए शिक्षक ही जिम्मेदार है?
किसी विद्यालय में कमी मिले तो जांच होनी चाहिए। जहाँ शिक्षक दोषी हों, वहाँ कार्रवाई भी होनी चाहिए।
लेकिन बिना जांच, बिना तथ्य और बिना शिक्षक का पक्ष सुने किसी को सार्वजनिक रूप से दोषी ठहरा देना क्या न्यायसंगत है?
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सबसे बड़ा सवाल समाज से
जिस अध्यापक ने कभी हमें अक्षर ज्ञान दिया, पढ़ना-लिखना सिखाया, सही-गलत का फर्क समझाया और जीवन में आगे बढ़ने का रास्ता दिखाया, क्या उसी शिक्षक को हर समस्या का पहला और अंतिम दोषी मान लेना उचित है?
क्या शिक्षक समाज का विरोधी है?
नहीं।
शिक्षक इसी समाज का हिस्सा है और इसी समाज के बच्चों का भविष्य गढ़ रहा है।
पांचों उंगलियां बराबर नहीं होतीं। कहीं कमियां हो सकती हैं, कहीं लापरवाही भी हो सकती है। ऐसे मामलों में कार्रवाई होनी चाहिए।
लेकिन कुछ लोगों की गलती के कारण लाखों ईमानदार और मेहनती शिक्षकों को एक ही तराजू में तौलना भी अन्याय है।
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अच्छे विद्यालयों पर कैमरा कब जाएगा?
लाखों सरकारी विद्यालयों में प्रतिदिन अच्छे कार्य हो रहे हैं।
कितने कैमरे उन शिक्षकों तक पहुँचते हैं जो सीमित संसाधनों में बच्चों को बेहतर शिक्षा देने का प्रयास कर रहे हैं?
कितने वीडियो उन शिक्षकों के बनते हैं जो अपने प्रयास से बच्चों की मदद करते हैं?
कितने विद्यालयों की अच्छी उपस्थिति, बेहतर शिक्षण और बच्चों की उपलब्धियों को प्रमुखता मिलती है?
शायद इसलिए नहीं कि अच्छी खबर में मसाला कम होता है और विवादित खबर जल्दी वायरल होती है।
TRP और व्यूज की दौड़ में यह याद रखना चाहिए कि एक वायरल वीडियो सिर्फ एक विद्यालय की छवि नहीं बिगाड़ता, वह हजारों शिक्षकों के प्रति समाज की धारणा को भी प्रभावित करता है।
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पत्रकारिता का उद्देश्य फैसला सुनाना नहीं है।
पत्रकारिता का काम सवाल पूछना है, जांच करना है और सच्चाई सामने लाना है।
बिना जांच किसी को दोषी घोषित करना पत्रकारिता नहीं, बल्कि धारणा बनाना है।
विभाग से भी विनम्र अपेक्षा है—
अपने शिक्षकों पर विश्वास कीजिए।
जहाँ गलती हो, निष्पक्ष जांच कीजिए।
जहाँ शिक्षक अच्छा कार्य कर रहे हों, उन्हें पहचानिए और प्रोत्साहित कीजिए।
क्योंकि शिक्षक को हर समय संदेह की नजर से देखने से शिक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं होगी।
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विद्यालय समाज का है।
बच्चे समाज के हैं।
शिक्षक भी इसी समाज का है।
इसलिए विद्यालय में कैमरा लेकर जाने से पहले एक बार यह भी सोचिए—
क्या हम समस्या खोजने जा रहे हैं या समाधान खोजने?
क्योंकि शिक्षक को कटघरे में खड़ा करना बहुत आसान है,
लेकिन शिक्षक का सम्मान बचाते हुए वास्तविक समस्या तक पहुँचना ही सच्ची जिम्मेदारी है।
और अंत में भारतेंदु हरिश्चंद्र की ‘अंधेर नगरी’ की वह व्यवस्था याद आती है, जहाँ दोषी कोई हो, लेकिन फंदा उसी के गले में डाला जाता है जिसमें वह फिट आ जाए।
आज के शिक्षक की स्थिति भी कहीं-कहीं ऐसी ही न हो जाए—
दोष किसी का हो, सवाल शिक्षक से।
व्यवस्था किसी की हो, जवाब शिक्षक से।
समस्या किसी की हो, कार्रवाई शिक्षक पर।
यह स्थिति बदलनी होगी।
शिक्षक को जवाबदेह जरूर बनाइए,
लेकिन उसे हर समस्या का दोषी मत बनाइए।
क्योंकि—
जिस समाज ने शिक्षक को सम्मान देना छोड़ दिया,
वह आने वाली पीढ़ी को सम्मान, संवेदना और न्याय का पाठ कैसे पढ़ाएगा?